Tuesday, March 16, 2010

हमारी व्‍यथा

कोशीलोक कोशी क्षेत्र के दु:ख दर्द को समर्पित है। जैसा कि सबको मालूम है कि वर्ष 2008 में कोशी में प्रलयंकारी बाढ़ आने के बाद बिहार के पांच जिलों सुपौल, अररि‍या, सहरसा, मधेपुरा और पूर्णिया के करीब पचास लाख से अधिक लोग बेघर हो गए। उनकी खेती तबाह हो गई। उनके व्‍यापार बर्बाद हो गए। उनके घरों में संचित अनाज पानी में बह गए। उनके सामने निवाला का संकट पैदा हो गया। उन्‍हें घरबार छोड़ना पड़ा। लोगों को अपने रिश्‍तेदारों या शिविरों में शरण लेना पड़ा। सरकारी और निजी स्‍तर पर उन्‍हें तत्‍काल राहत तो प्रदान हुआ पर कोशी क्षेत्र की तबाही इतना विकराल थी कि राहत प्‍यासे के लिए ओस के बूंद साबित हुई। आज करीब दो साल बाद भी लोगों की खेती नहीं हो पा रही है, कारण कि कोशी की बाढ़ ने उक्‍त पांचों जिलों की खेती योग्‍य जमीनों को स्‍थाई बंजर बना दिया है। दरअसल कोशी नदी अपने साथ नेपाल के पहाड़ से भारी मात्रा में बालू, कंक्रीट आदि बहा कर लाती है और इसका पानी जिस क्षेत्र में जाता है उस क्षेत्र की जमीन को वह बालू व कंक्रीट से पाट देता है। जिसके चलते उर्वरा जमीन बंजर में तब्‍दील हो जाती है। इस बार कोशी की बाढ़ ने अपना और रौद्र रूप दिखाया था। जमीन को करीब तीन से चार फुट तक बालू से पाट दिया है। जमीन अभी भी बंजर है। खेती नहीं हो पा रही है। पूंजी के अभाव में लोग अपना व्‍यापार शुरू नहीं कर पाए। जीविका के लिए लोग पलायन को मजबूर हैं, पर बिहार सरकार दुनिया के सामने विकास की गाथा लिख रही है। जबकि कोशी क्षेत्र के पुर्नवास के लिए कुछ नहीं किया है, यहां तक कि बाढ़ के दोषी‍ मंत्री तक को सजा नहीं दी, उल्‍टे उन्‍हें पुरस्कृ‍त किया। बिहार सरकार के पास कोशी क्षेत्र के विकास के लिए कोई योजना तक नहीं है। बिहार सरकार कोशी क्षेत्र के वासियों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। यह तो सरकार का चेहरा है। ऐसे में वक्‍त आ गया है कि अपने हक के लिए संगठित होकर अपनी आवाज बुलंद करें। चुप रहने से कुछ नहीं होगा।

Sunday, March 7, 2010

koshilok koshi baadhpiditon ke dard ka manch hai.Yah baadhpiditon ki tabahi ki bayan-e-dastan hai.